नदी का पत्थर"

 बहुत समय पहले, एक गाँव में रोहन नाम का एक युवक रहता था, जो मूर्तिकार बनना चाहता था। उसने एक बड़े गुरु के पास जाकर कहा, "गुरुजी, मुझे दुनिया की सबसे खूबसूरत मूर्ति बनानी है, लेकिन मेरे पास धैर्य नहीं है। मुझे कोई ऐसा तरीका बताइए जिससे मैं जल्दी से सफल हो जाऊँ।"


गुरु मुस्कुराए और रोहन को नदी किनारे ले गए। उन्होंने नदी के बीच में पड़ा एक बड़ा, खुरदरा पत्थर दिखाया और कहा, "तुम्हें इस पत्थर को तराशना है।"

रोहन ने अपना हथौड़ा और छेनी निकाली और पूरे जोश में पत्थर पर वार करने लगा। वह सुबह से शाम तक मेहनत करता रहा। एक हफ्ता बीत गया, लेकिन पत्थर का आकार ज़रा भी नहीं बदला। रोहन निराश हो गया।

वह गुरु के पास गया और कहा, "यह पत्थर बहुत कठोर है, यह मुझसे नहीं टूटेगा।"

गुरु ने कहा, "तुम ताकत गलत जगह लगा रहे हो। कल से, तुम इस पत्थर पर दिन में बस 100 बार चोट करना। न एक ज़्यादा, न एक कम। और हर चोट पूरी एकाग्रता से करना।"

रोहन को यह बात अजीब लगी। 100 चोट से क्या होगा? लेकिन उसने गुरु की बात मान ली।

पहले दिन उसने 100 चोट कीं, कुछ नहीं हुआ।

एक हफ्ता बीता, पत्थर वैसा ही था।

एक महीना बीता, पत्थर पर बस कुछ खरोंचें थीं।

छह महीने बीत गए। रोहन अब थक गया था, लेकिन वह हर दिन जाकर अपनी 100 चोटें पूरी करता रहा।

फिर एक दिन, जब रोहन ने अपनी 99वीं चोट मारी, पत्थर वैसा ही रहा। लेकिन जैसे ही उसने 100वीं चोट मारी, पत्थर में एक बड़ी दरार आ गई और वह दो हिस्सों में बँट गया, जिससे अंदर का चिकना हिस्सा दिखने लगा।

रोहन हैरान रह गया। वह गुरु के पास भागा।

गुरु ने समझाया, "बेटा, पत्थर उस आखिरी चोट से नहीं टूटा। वह उन हज़ारों चोटों से टूटा है जो तुमने पिछले छह महीनों में लगातार मारी हैं। सफलता भी ऐसी ही होती है। यह किसी एक दिन के बड़े प्रयास से नहीं मिलती, बल्कि हर दिन किए गए छोटे और निरंतर प्रयासों से मिलती है।"

सीख: बड़े लक्ष्य एक दिन में हासिल नहीं होते। वे रोज़ाना के छोटे, अनुशासित और निरंतर प्रयासों का परिणाम होते हैं। बस, हर दिन 1% बेहतर करते रहें।

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