बुद्धिमान मछुआरा और सोने की मछली
एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में रवि नाम का एक गरीब मछुआरा रहता था। वह अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों के साथ रहता था, और उसकी कमाई मुश्किल से उनके परिवार का पेट भर पाती थी। रवि बहुत मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था।
एक दिन, रवि रोज़ की तरह अपनी नाव लेकर नदी में मछली पकड़ने गया। उसने अपना जाल फेंका और थोड़ी देर इंतज़ार किया। जब उसने जाल खींचा, तो वह खुशी से उछल पड़ा - जाल में एक बहुत बड़ी और सुनहरी मछली फँसी हुई थी! वह मछली सोने की तरह चमक रही थी।
रवि ने मछली को देखा और आश्चर्यचकित रह गया। उसने मछली को बाहर निकाला। जैसे ही उसने मछली को हाथ लगाया, मछली ने एक मधुर, मानवीय आवाज़ में बोलना शुरू कर दिया:
"हे भले मछुआरे, कृपया मुझे मत मारो! मैं कोई साधारण मछली नहीं हूँ, मैं एक जादुई मछली हूँ। अगर तुम मुझे आज़ाद कर दोगे, तो मैं तुम्हें एक वरदान दूँगी। तुम जो भी माँगोगे, मैं उसे पूरा कर दूँगी।"
रवि ने पहले कभी किसी मछली को बोलते हुए नहीं सुना था। वह थोड़ा डर गया, लेकिन उसके मन में लालच नहीं आया। उसने सोचा कि यह मछली उसके परिवार की गरीबी दूर कर सकती है।
रवि ने कहा, "ठीक है, जादुई मछली। अगर तुम सच में जादुई हो, तो मेरे परिवार के लिए बस एक सुंदर, मजबूत घर दे दो। हमें इस टूटी-फूटी झोपड़ी में रहना पड़ता है।"
मछली ने मुस्कुराया और कहा, "बस इतना ही? तुम्हारी इच्छा पूरी होगी, लेकिन याद रखना, लालच बुरी बला है। अब मुझे जाने दो।"
रवि ने तुरंत मछली को वापस पानी में छोड़ दिया। जैसे ही मछली पानी में तेज़ी से तैरती हुई दूर गई, रवि अपनी नाव लेकर घर लौट आया।
जब वह घर पहुँचा, तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं। उसकी टूटी-फूटी झोपड़ी की जगह पर एक आलीशान और सुंदर घर खड़ा था! उसकी पत्नी और बच्चे बाहर खड़े थे, खुशी से झूम रहे थे।
कुछ हफ्ते बीत गए, और रवि का परिवार नए घर में खुशी-खुशी रहने लगा। लेकिन रवि की पत्नी, सीता, संतुष्ट नहीं थी। एक दिन उसने रवि से कहा:
"रवि, यह घर तो ठीक है, पर मेरे पास पहनने के लिए सोने के गहने नहीं हैं। तुम जाओ और उस सोने की मछली से सोने के गहने मांगो।"
रवि को यह सुनकर अच्छा नहीं लगा, उसने अपनी पत्नी को समझाने की कोशिश की, "सीता, हमें संतुष्ट रहना चाहिए। हमने जो मांगा, मछली ने हमें दे दिया।"
लेकिन सीता बहुत ज़िद करने लगी, "अगर तुम नहीं जाओगे, तो मैं तुमसे कभी बात नहीं करूंगी।"
हार मानकर, रवि फिर से नदी किनारे गया और आवाज़ लगाई, "ओ जादुई मछली, क्या तुम सुन रही हो?"
सोने की मछली पानी से बाहर आई, "क्या हुआ, मछुआरे? तुम फिर क्यों आए?"
रवि ने शर्मिंदा होते हुए अपनी पत्नी की इच्छा मछली को बताई।
मछली ने एक गहरी साँस ली और कहा, "ठीक है। तुम्हारी पत्नी को बहुत सारे सोने के गहने मिलेंगे, लेकिन याद रखना, अगली बार तुम्हारी इच्छाएँ पूरी नहीं होंगी, क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती।"
रवि जब घर लौटा, तो उसकी पत्नी ने ढेर सारे सोने के गहने पहन रखे थे। वह बहुत खुश थी।
महीने बीत गए। अब रवि की पत्नी और भी अधिक लालची हो गई थी। एक शाम उसने रवि से कहा, "यह सब अच्छा है, रवि, लेकिन मैं अब इस गाँव की रानी बनना चाहती हूँ! जाओ और मछली से कहो कि वह मुझे इस राज्य की रानी बना दे।"
इस बार रवि बहुत नाराज़ हुआ। उसने कहा, "सीता, तुम बहुत लालची हो गई हो! हमें घर और गहने मिले, हमें अब और कुछ नहीं चाहिए।"
लेकिन उसकी पत्नी नहीं मानी, वह ज़ोर-ज़ोर से रोने और चिल्लाने लगी।
निराश होकर, रवि अगली सुबह फिर नदी के किनारे गया। उसने आवाज़ लगाई, "ओ जादुई मछली!"
मछली धीमी गति से पानी की सतह पर आई। उसके चेहरे पर उदासी थी।
रवि ने दबे स्वर में अपनी पत्नी की सबसे बड़ी और मूर्खतापूर्ण इच्छा मछली को बताई।
मछली ने रवि की ओर देखा और कहा, "मछुआरे, मैंने तुम्हें दो बार चेतावनी दी थी। तुम्हारी पत्नी का लालच इतना बढ़ गया है कि अब वह राजा से भी ऊपर जाना चाहती है। मैंने तुम्हें कहा था कि लालच की कोई सीमा नहीं होती, और अब वह लालच तुम्हें सब कुछ वापस ले लेगा।"
मछली ने एक पल के लिए पानी में छलांग लगाई और फिर गायब हो गई।
रवि दुखी मन से घर लौटा। जब वह अपनी गली में पहुँचा, तो उसने देखा कि उनका सुंदर घर और उसकी पत्नी के गहने गायब हो गए थे। उसकी पत्नी और बच्चे फिर से उस पुरानी, टूटी-फूटी झोपड़ी के बाहर उदास खड़े थे। उसकी पत्नी सीता अब समझ गई थी कि लालच का क्या नतीजा होता है।
सीख: लालच हमेशा बुरी बला होती है। हमें जो मिला है
, उसमें संतुष्ट रहना चाहिए।
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