जादव पायेंग: एक इंसान जिसने मरुस्थल को बनाया स्वर्ग

जादव पायेंग: एक इंसान जिसने मरुस्थल को बनाया स्वर्ग (भारत के 'फॉरेस्ट मैन' की पूरी गाथा)
जादव पायेंग अपने विशाल मोलाई फॉरेस्ट में पौधा लगाते हुए - द फॉरेस्ट मैन
जादव पायेंग पौधा लगाते हुए

दुनिया जब जलवायु परिवर्तन और बढ़ती गर्मी से जूझ रही है, तब असम के माजुली द्वीप से एक ऐसी कहानी निकलती है जो नामुमकिन को मुमकिन बनाती है। यह कहानी है जादव 'मोलाई' पायेंग की, जिन्होंने अकेले अपने दम पर 1,360 एकड़ (लगभग 550 हेक्टेयर) का घना जंगल खड़ा कर दिया । आज यह 'मोलाई फॉरेस्ट' न्यूयॉर्क के सेंट्रल पार्क से भी बड़ा है और दुनिया के लिए प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है । 
एक त्रासदी जिसने बदल दी जीवन की दिशा (1979 की घटना)
जादव पायेंग की यात्रा 1979 में शुरू हुई, जब वे मात्र 16 वर्ष के थे । ब्रह्मपुत्र नदी में आई भीषण बाढ़ के बाद, उन्होंने एक रेतीले टापू पर सैकड़ों सांपों को मृत अवस्था में देखा। वे सांप गर्मी और पेड़ों की छाया न होने के कारण झुलसकर मर गए थे । इस दृश्य ने जादव को झकझोर दिया। उन्होंने सोचा, "यदि आज सांप मर रहे हैं, तो कल हम इंसान भी ऐसे ही मरेंगे" । यहीं से उनके जीवन का मिशन शुरू हुआ—बंजर रेत पर जीवन उगाना। 
हमारे '

3 फिल्टर्स' का नजरिया: क्यों खास है मोलाई फॉरेस्ट?

मेट्रो पुल के नीचे रोशनी में पढ़ते हुए गरीब बच्चे और उनकी शिक्षिका
शिक्षा जीवन का आधार

1 पारिस्थितिक चमत्कार

वैज्ञानिकों के लिए मोलाई फॉरेस्ट 'पारिस्थितिक अनुक्रमण' (Ecological Succession) का एक अद्भुत उदाहरण है। शोध बताते हैं कि 40 वर्षों के बाद, इस मानव निर्मित वन की मिट्टी की उर्वरता और कार्बन सोखने की क्षमता (Carbon Sequestration) एक प्राकृतिक वन के बराबर हो गई है । जादव ने पहले बांस रोपे, फिर मिट्टी को उपजाऊ बनाने के लिए लाल चींटियां छोड़ीं और धीरे-धीरे शीशम, अर्जुन और सिमोलू जैसे स्वदेशी पेड़ लगाए । आज यह जंगल हजारों टन कार्बन सोखकर पर्यावरण को बचा रहा है । 
रिसाइकिल सामग्री से बना रंगीन और स्वच्छ सामुदायिक केंद्र - स्वच्छता अभियान
रिसाइकिल सामग्री से बना रंगीन और स्वच्छ सामुदायिक केंद्र - स्वच्छता अभियान

2. आध्यात्मिक और सांस्कृतिक फिल्टर: 

प्रकृति ही ईश्वर है
जादव पायेंग असम की मिशिंग जनजाति से आते हैं, जहाँ प्रकृति की पूजा 'दोबुर उई' (Dobur Uie) जैसे अनुष्ठानों के माध्यम से की जाती है । पायेंग का मानना है कि "प्रकृति ही ईश्वर है" । उनके लिए जंगल का निर्माण कोई प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है। वे मानते हैं कि हम प्रकृति को बचाएंगे, तो ही प्रकृति हमें बचाएगी—यही 'वसुधैव कुटुंबकम' का असली सार है।

3. महान लेखकों और विचारकों का नजरिया

जादव पायेंग ने वैश्विक मंचों (जैसे पेरिस जलवायु सम्मेलन) पर दुनिया के नेताओं से एक सीधा सवाल पूछा: "हम अर्थव्यवस्था की बात करते हैं, लेकिन ऑक्सीजन के लिए क्या कर रहे हैं? केवल पेड़ ही हमें सांस दे सकते हैं" । उनके विचार प्रसिद्ध पर्यावरणविदों के उस सिद्धांत को पुष्ट करते हैं कि व्यक्तिगत जिम्मेदारी ही वैश्विक बदलाव की पहली सीढ़ी है। 
मोलाई फॉरेस्ट 2.0: विरासत को आगे बढ़ाती बेटी मुनमुनी
जादव पायेंग की विरासत अब उनकी बेटी मुनमुनी पायेंग के हाथों में है। 2022 में उन्होंने 'मोलाई कठोनी 2.0' की शुरुआत की, जिसके तहत 2024 तक लगभग 10 लाख नए पौधे लगाए जा चुके हैं । यह प्रोजेक्ट 'सस्टेनेबल ग्रीन इनिशिएटिव' (Sustainable Green Initiative) के सहयोग से चल रहा है, जिसका लक्ष्य माजुली के अन्य बंजर हिस्सों को हरा-भरा करना है । 
हालिया चुनौतियां: रेत माफिया और आगजनी (2025-26)
जादव पायेंग बंजर भूमि पर पौधा लगाते हुए और पीछे घना जंगल - पॉजिटिव न्यूज़
जादव पायेंग बंजर भूमि पर पौधा लगाते हुए और पीछे घना जंगल - 

दिसंबर 2025 में, असामाजिक तत्वों ने मोलाई फॉरेस्ट 2.0 के एक हिस्से में जानबूझकर आग लगा दी, जिससे लगभग 5,000 से 5,500 पौधे जलकर खाक हो गए । यह हमला उस समय हुआ जब जादव पायेंग अवैध रेत खनन (Sand Mining) का विरोध कर रहे थे । माफियाओं को डर है कि जंगल बढ़ेगा तो वे रेत नहीं निकाल पाएंगे। लेकिन जादव और उनका परिवार डटा हुआ है; मुनमुनी ने खुद ग्रामीणों के साथ मिलकर इस आग को बुझाया । 

जादव पायेंग का समाधान: "प्रवेश पौधा कार्यक्रम"
जादव जी का मानना है कि पर्यावरण को बचाने के लिए बच्चों को बचपन से जोड़ना होगा। उन्होंने प्रस्ताव दिया है कि:
एक व्यक्ति बुजुर्ग को सम्मान के साथ भोजन देते हुए - मानवता की सेवा
एक व्यक्ति बुजुर्ग को सम्मान के साथ भोजन देते हुए - 

हर बच्चे को स्कूल में प्रवेश (Admission) के समय दो पौधे लगाने चाहिए । 

स्कूल छोड़ने तक उन पेड़ों की देखभाल की जिम्मेदारी बच्चे की होनी चाहिए।
उनका दावा है कि यदि यह शिक्षा का हिस्सा बन जाए, तो भारत 10 वर्षों में पूरी तरह हरा-भरा हो जाएगा ।

निष्कर्ष: 

समाज और मानव कल्याण का संदेश
जादव 'मोलाई' पायेंग, जिन्हें 2015 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया, आज भी एक साधारण झोपड़ी में रहते हैं और दूध बेचकर अपना गुजारा करते हैं । उनका जीवन हमें सिखाता है कि एक अकेला इंसान भी अगर संकल्प ले ले, तो वह पूरी दुनिया के लिए ऑक्सीजन का बैंक खड़ा कर सकता है। 
सन्देश: जादव पायेंग ने अपना काम कर दिया है। अब बारी हमारी है कि हम उनके द्वारा लगाए गए पेड़ों की और इस धरती की रक्षा करें।
लेखक: रोहित कुमार

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